ज़िन्दगी समझ जाएगी

ज़िन्दगी तो कोरा कागज़ है
कुछ भी लिख दो, यह तो समझ जाएगी

मान लेगी उसे अपनी किस्मत
और उसे सुधारने में लग जाएगी

राही तु डगर पर पांव तो रख
मंजिल ख़ुद-बा-ख़ुद तुझे नज़र आएगी

यूहीं लंबी लगती है डगर तुझको
कुछ घड़ियों में ही यह गुज़र जाएगी

गर कभी थोड़ी खुशियां, ज़्यादा गम हो
तो देख लेना उनके, जिनसे तुम्हारे कम हो
उन के देखते ही, ख़ुद के यह भूल जाएगी

ज़िन्दगी ना रुकती है, ना तुम रुकना
गर लगा के तुम हारे, फिर भी ना झुकना
चलते चलते यह ख़ुद ही संभल जाएगी

गर समझ कर जिये, जैसे जीना है
तो हर दिन उजियारा और रात पूर्णिमा है
फिर तो मौत भी पूछ कर आएगी

ज़िन्दगी तो कोरा कागज़ है
कुछ भी लिख दो, यह तो समझ जाएगी।

आंदोलन

मंदिर मेहलों से सजे है
लोग लिए खड़े ध्वजे है
फिर भी शांति क्यों नहीं

और लोग बदलने को तैयार है
सड़को पर खड़े मांग रहे अधिकार है
फिर भी क्रांति क्यों नहीं

कुछ इसी तरह के सवाल
पीछले पच्चीस वर्षों से पूछ रहा हूं
नैतिक ज़िम्मेदारी और निजी स्वार्थ
इन दोनों मै ही जूझ रहा हूं

यह वही सवाल है जो की
सदियों से पूछे जा रहे हैं
कोई भी इन से अछूता नहीं है
यह हर किसी के ज़हन में आ रहे है

पर समाज की बुनियाद पर
कैसे पड़े प्रभाव
यह बात जानने लायक है
मिलके खो़जते है हम और आप

ख़ोजा तो पाया कि इंसान का जीवन
पेट की भूख से बंधा है
बदलना और करना तो हर कोई बहुत कुछ चाहता है
पर जरूरते ज़िन्दगी में ही फसां है

थाली की रोटी में ही छूपी
इंसान की क्रांति और शांति है
इसी के लिए मंदिरों में गर्दनें झुकती है
और जनता सरकारों को मानती है

फिर तो जिस दिन थाली में से रोटी जाएगी
उसी दिन इंसान करहाएगा
उस दिन एक नया गांधी पैदा होगा
और मेरे देश में आंदोलन आएगा।