क्या है ज़िन्दगी – 2

क्या है ज़िन्दगी?
कुछ भी तो नहीं
बेचारी सांसों की मोहताज़ है

भर्ती है, रोकती है, छोड़ देती है
क्यूंकि अगले सांस की आस है

इसी कशमकश को ज़िन्दगी कहते है
किराए के इस मकान में
ऊपर के चोबरे मैं हम रहते है।

हम है आज़ाद परिंदे

हर गम से तु
मज़बूरी से
आज़ादी दे

ओ मौला
मुझे आज़ाद
कर दे

मेरे पंखों को
खुलने की
जगह दे

इतनी की
सूरज को भी
हम छुपा दे

ओ मौला
मुझे आज़ाद
कर दे

कुछ पाने कि
हर ख्वाहिश ही
फ़ना कर दे

तेरे इश्क़ की
चाहत से ही
मुझे भर दे

ओ मौला
मुझे आज़ाद
कर दे

मेरे कन कन को
आज़ादी से
ऐसे भर दे

की सांस-सांस मेरी बोले
हम है
आज़ाद परिंदे

हम है
आज़ाद परिंदे